महात्मा गाँधी राज्य ग्रामीण विकास संस्थान जबलपुर (म.प्र.)

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त्रैमासिक - तृतीय संस्करण अप्रैल,2011
अनुक्रमणिका हमारा संस्थान
  1. अब बनेगा महिला जनप्रतिनिधियों का नेटवर्क
  2. पेसा एक्ट, 1996 के संदर्भ में प्रशिक्षण सामग्री को अन्तिम स्वरूप दिया गया
  3. अपनी बात .....
  4. पंचायती राज व्यवस्थाओं में महिलाओं का 50 प्रतिशत आरक्षणः सशक्तिकरण का एक उपाय
  5. सफलता की कहानी - सरपंच की जुबानी
  6. सीप का मोती
  7. बदलती तस्वीर (चित्र कथा)
  8. पेसा एक्ट, 1996 विषय पर प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण

अब बनेगा महिला जनप्रतिनिधियों का नेटवर्क

मध्य प्रदेश में पंचायतों में महिलाओं की 50 प्रतिशत आरक्षण की सुविधा दी गयी है, और वर्तमान पंचायतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी 50 प्रतिशत से अधिक है, और महिलायें अपनी क्षमता के साथ अपनी भूमिका का निर्वहन कर रही है परन्तु अभी भी महिलाओं को और सशक्त करना होगा, ताकि महिलायें राजनैतिक क्षेत्र में मजबूती के साथ स्थापित होकर समाज को नयी दिशा व ऊर्जा प्रदान कर सकेंगी, लेकिन प्रत्यक्ष राजनीति ग्रामीण महिलाओं के जीवन का कतिपय नवीन पहलू है, इसलिये यह आवश्यक है कि वे इस क्षेत्र में कार्यरत् महिलाओं के साथ अपनी पकड़ मजबूत करें, इसके लिए अति आवश्यक है कि महिला जनप्रतिनिधि का एक नेटवर्क बने ताकि एक दूसरे की सफलताओं और प्रयासों से प्रेरणा लेकर स्वयं को सशक्त कर समाज को ऊर्जा प्रदान कर सकें।

उक्त उद्गार विश्व महिला दिवस के शताब्दी वर्ष 8 मार्च 2011 के उपलक्ष्य में, प्रदेश के 20 जिलों की विभिन्न पंचायतों की निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की म.गाँ.रा.ग्रा.वि.संस्थान-म.प्र. जबलपुर में आयोजित एक दिवसीय बैठक में संस्थान के संचालक श्री के.के. शुक्ल ने अपने उद्बोधन में व्यक्त किये।


इस बैठक में प्रतिभागियों को स्वैच्छिक नेटवर्क पर आधारित फिल्म "बढ़ते कदम" दिखाई गयी तथा टीम की भावना प्रबल करने कारकों की पहचान करने के उद्देश्य से "ब्रोकन स्क्वायर" गेम भी कराया गया। इस अवसर पर विभिन्न पंचायत प्रतिनिधियों ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए माना कि महिलाओं का सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ राजनीतिक सशक्तिकरण भी शुरू हो चुका है। सत्र समन्वयक श्रीमति स्वप्निल रावत ने आगे यह भी बताया कि बैठक में शामिल महिलाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में महिला जनप्रतिनिधियों का नेटवर्क बनाने का ध्वनि मत से संकल्प लिया।

  अनुक्रमणिका  
पेसा एक्ट, 1996 के संदर्भ में प्रशिक्षण सामग्री को अन्तिम स्वरूप दिया गया

इस हेतु दिनांक 11.02.2011 को संस्थान में आयोजित कार्यशाला में वाणिज्यिक कर विभाग, जल संसाधन, पशुपालन, मछली पालन, राजस्व, आवास, पर्यावरण, पुनर्वास, सामान्य प्रशासन, आदिवासी कल्याण विभाग तथा मध्यप्रदेश बायोडाइवर्सिटी बोर्ड, राज्य रोजगार गारंटी परिषद से विभिन्न प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यशाला में विभिन्न विभागों के संबंधित अधिकारियों ने अपने विचार व्यक्त किये।

इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय दिल्ली के अधिवक्ता श्री संजय उपाध्याय ने पावर प्वाइंट प्रस्तुतीकरण के माध्यम से प्रतिभागियों संबोधित किया तथा पेसा एक्ट, 1996 के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि यह केवल एक कानून ही नहीं है अपितु यह स्वशासन की एक व्यवस्था है और यही इस कानून को बनाने का मूल उद्देश्य भी हैं। उन्होंने बताया कि इस कानून में तीन प्रमुख मुद्दे - विकास संबंधी, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंध, पारम्परिक रूप से विवादों का निपटारा आदि समाहित हैं।

श्री उपाध्याय के प्रस्तुतीकरण के पश्चात् सभी उपस्थित प्रतिभागियों ने तैयार प्रशिक्षण सामग्री पर के साथ अपनी सहमति प्रदान की।





  अनुक्रमणिका  
अपनी बात ....
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पंचायती राज व्यवस्थाओं में महिलाओं का 50 प्रतिशत आरक्षणः सशक्तिकरण का एक उपाय

महिला सशक्तिकरण

अनूसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के बाद, महिलाएं ऐसी तीसरी विशेष श्रेणी है, जिसके प्रति समाज में विशेष ध्यान देना जरूरी है। विकास प्रक्रिया में महिलाओं एवं बच्चों के विकास का सामान्य रूप से और विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद महत्व है। हमारे देश की आधी आबादी मोटे तौर पर महिलाओं से बनी है, इसलिए इनके विकास का असीम महत्व है।

महिला सशक्तिकरण से हमारा तात्पर्य महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता को समाहित करते हुए सामाजिक सेवाओं के समान अवसर प्रदान करना, राजनैतिक और आर्थिक नीति निर्धारण में भागीदारी, समान कार्य के लिए समान वेतन, कानून के तहत् सुरक्षा देने का अधिकार आदि प्रदान करने से है। आज जरूरत इस बात की है कि महिलाओं में आत्मशक्ति के बारे में चेतना जागृत की जाए जिससे न केवल महिलाओं का कल्याण होगा, बल्कि वे सामाजिक विकास की प्रवर्तक भी बन सकेंगी। एक सशक्त महिला न केवल स्वयं अपने लिए बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए भी उपयोगी व महत्वपूर्ण साबित होगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महिलाओं में आत्मविश्वास, अपने अधिकारों के बारे में जागरूकता तथा अन्याय से लड़ने की नैतिक शक्ति शिक्षा से ही पैदा होती है ।

सशक्तिकरण ऐसी प्रक्रिया है जो एक व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक दृष्टि से अपने विकास के संबंध में ठोस निर्णय लेने और प्रभावी गतिविधियों में शामिल होने के योग्य बनाती है। सशक्तिकरण की प्रक्रिया मे कुछ महत्वपूर्ण गतिविधियाँ सम्मिलित हैं, जैसे: (क) निर्णय लेना, (ख) रूचियों एवं आवश्यकताओं की पहचान करना, (ग) लक्ष्यों को स्पष्ट करना, (घ) कार्यक्रमों एवं योजनाओं को लागू करना, (च) गतिविधियों पर निगरानी और उन पर सदैव ध्यान बनाए रखना, (छ) मूल्यांकन, और (ज) भावी योजनाओं की कार्ययोजना बनाना। अभी कुछ समय पहले तक, महिलाओं को ऐसे किसी भी कार्य में भाग लेने की स्वतंत्रता नहीं थी। सिर्फ 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम - 1992 के लागू होने से ही विकास के लिए महिलाओं को सशक्त करने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। विकेंद्रीकरण के दौर वाले 15 वर्ष भी महिलाओं को पूरी तरह सशक्त नहीं कर पाए हैं। इसका एक मुख्य कारण संभवतया यह है कि हम इनमें नेतृत्व की भावना जाग्रत नहीं कर पाए है, जो कि इस संबंध मे तत्काल जरूरी है। अब सवाल यह उठता है कि महिला नेतृत्व की आवश्यकता क्यों है ?

महिलाएं पूरे विकास का केन्द्र बिन्दु हैं। प्रगति की दिशा में किसी भी सतत् परिवर्तन के लिए महिलाओं की भागीदारी अति आवश्यक है। आज का युग सूचना क्रान्ति का युग है जिस कारण विश्व आज एक छोटे से गांव जैसा प्रतीत होता है। महिलाएं आज हवाई जहाज उड़ाती है, कम्पनियां चलाती हैं, कालेजों में प्राचार्य हैं, वैज्ञानिक हैं। इतना होने के बावजूद भी महिलाओं के साथ आज भी भेदभाव किया जाता है। उन्हें आज भी पुरूषों के मुकाबले कमजोर समझा जाता है। केवल ये कारण ही महिलाओं की कम भागीदारी के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि ऐसे अनेक कारण हैं। कई बार तो महिलाऐं ही महिलाओं की प्रगति में बाधा खड़ी करती है, रूढि़यों और परम्पराओं का हवाला देकर वे ही अपने घरों में लड़कियों और महिलाओं को बाहर नहीं निकलने देती, न ही शिक्षा दीक्षा लेने देती है। कन्या भ्रूण हत्या, पुरूष प्रधान समाज, बालिकाओं के प्रति उपेक्षा, आदि अन्य कारक हैं जो बताते हैं कि अब समय महिला नेतृत्व का है। यहां यह कहना गलत न होगा कि पंचायती राज में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी महिला नेतृत्व के विकास में एक क्रांतिकारी कदम है। कई राज्यों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, जिनमें मध्यप्रदेश भी एक है। शैक्षिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास की दृष्टि से महिलाओं की वर्तमान स्थिति, देश के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न है। विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं पर निर्धनता की मार सबसे अधिक पड़ती है और महिला प्रधान परिवारों के मामले में ऐसी स्थिति अधिक देखने को मिलती है। अब हम निम्न उप-भागों में महिलाओं की स्थिति पर विविध पक्षों से दृष्टि डालेंगे और साथ की समूचे देश में इनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए अपनाए जाने वाले जरूरी उपायों की भी चर्चा करेंगे ।

महिलाओं की आर्थिक स्थिति

ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकतर महिलाएं कामकाजी हैं। इनमें से कुछ खेती बाड़ी के उद्देश्य से खेतों में काम करती हैं तो कुछ घरों में पशुओं की देखभाल

करती हैं, घरों के जरूरी कामकाजों को भी निपटाती है, जैसे चूल्हा आदि जलाने के लिए लकड़ी एकत्र करना, पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करना और पीने के लिए पानी लाना। बच्चों को जन्म देकर, इनके पालन-पोषण की समस्त जिम्मेदारियाँ पूर्णतया इन्हीं के कंधों पर होती हैं। लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं गैर-संगठित क्षेत्र में कार्यरत् हैं, जैसे खेतीबाड़ी, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गीपालन, मछलीपालन, रेशम उत्पादन, हथकरघा, हस्तशिल्प, वानिकी, लघु व्यवसाय एवं छोटे-मोटे वस्तुओं आदि की बिक्री। इसके अतिरिक्त, ये खेतों, निर्माण स्थलों एवं फैक्टरियों आदि में अकुशल मजदूरी आदि का काम भी करती हैं। इसी तरह, कपड़ों या बर्तनों आदि की धुलाई और सफाई और देखभाल संबधी कार्य भी महिलाएं ही करती हैं। सामाजिक दृष्टि से ये परिवार में पत्नी, माँ, गृहिणी और रसोइए आदि जैसी भिन्न-भिन्न भूमिकाऐं निभाती हैं। इन कामकाजों में से अधिकतर ऐसे हैं जिनके लिए इन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता। ये अपने-अपने परिवारों के लिए आमदनी का स्त्रोत हैं और इस तरह राष्ट्रीय आय में भी अपना योगदान देतीं हैं। इन सभी कार्यों के फलस्वरूप इनका अपना जीवन बेहद कठिन बन जाता है। इसके अलावा, स्व-रोजगार प्राप्त महिलाओं को भिन्न-भिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। चूँकि इनमें से अधिकतर निरक्षर एवं अप्रशिक्षित होती हैं, इसलिए इन्हें ऋण एवं साथ ही वस्तुओं के निर्माण के लिए कच्चे माल की प्राप्ति करने में बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसी तरह, प्रबंधन एवं विपणन में प्रशिक्षण के अभाव में इन्हें अपने उत्पादों को बेचने में बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ता है और इस दौरान बड़े व्यापारी कपट का सहारा लेकर माल का बड़ा मुनाफा खुद हड़प जाते हैं।

महिलाओं की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति

हमारे समाज में महिलाओं को बहुत सी सामाजिक बुराइयों का शिकार होना पड़ता है, जैसे छोटी आयु में विवाह, दहेज प्रथा आदि। परिणामस्वरूप भारत के पुरूष प्रधान समाज में इन्हें निम्न स्थिति का माना जाता है। इस स्थिति का एक चिंताजनक परिणाम यह है भारत में पुरूषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात निरंतर घट रहा है। यह सच है कि यह स्थिति हर राज्य में एक जैसी नहीं है - केरल में महिलाओं का अनुपात उच्चतम है और पंजाब जैसे समृद्ध राज्य में निम्नतम। समस्त राज्यों में हर साल बड़ी मात्रा में कन्या भ्रूण हत्याएं होती हैं। इस बुराई को तत्काल रोकना अत्यावश्यक है। कानून में लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष तय की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस कानून का भारी उल्लघंन किया जाता है। अधिकतर लड़कियों का विवाह छोटी आयु में ही कर दिया जाता है। इससे न सिर्फ लड़कियों के स्वास्थ्य पर ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, बल्कि इस कुरीति से अन्य बहुत सी समस्याओं की भी उत्पत्ति होती है। चूँकि ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकतर महिलाएं निरक्षर होती हैं, इसलिए इनको बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है-किशोरावस्था में गर्भधारण करना, गर्भावस्था के दौरान अपनी देखभाल न करना और शिशु को जन्म देने के बाद भी स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतना, कुपोषण, खराब चिकित्सीय सुविधाएं, अस्वच्छ दशाएं आदि। हमारे समाज में अधिकतर महिलाओं के सम्मुख आने वाली अन्य गंभीर समस्या है - हिंसा, जिसके अनेक रूप हैं, जैसे बलात्कार, दहेज न देने के कारण इन्हें मौत के घाट उतारना, घरेलू हिंसा और सती प्रथा। इन समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए विशेष रूप से महिलाओं के सर्वांगीण विकास पर लक्षित कार्यक्रमों को शुरू करने की आवश्यकता हैं। जिसके लिए महिला नेतृत्व की आवश्यकता है।

विकास में महिलाएं

महिला नेतृत्व का निर्माण करने के लिए यह जरूरी है कि विकास के लक्ष्यों को महिला सशक्तिकरण के माध्यम से पूरा करने के लिए विशेष रूप से निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को नियमित आधार पर प्रशिक्षण दिया जाये। इससे महिलाओं में ठोस नेतृत्व का उत्थान होगा, जिससे ऐसे महिला नेता सामने आयेंगी जो प्रभावी ढंग से अगुआई करने के योग्य होंगी। महिलाओं के शोषण एवं उत्पीड़न को रोकने के लिए उनका चहुंमुखी विकास जरूरी है। इसके लिए उनका कानूनी ज्ञान बढ़ाना भी समय की आवश्यकता है। यह बहुत जरूरी है कि महिलाओं में इस तरह की जागरूकता लाई जाऐ जिससे कि वे स्वयं सकारात्मक रूप से अपने कार्य संबंधी निर्णय ले पाने में सक्षम हो सकें और अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए परिवार के पुरूषों द्वारा नियंत्रित न हों।

महिला सशक्तिकरण को राष्ट्रीय कार्यसूची मे सम्मिलित करना बहुत से महिला मुद्दों के मुख्य समाधान के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए, महिला सशक्तिकरण को महिला विकास की प्रभावी समर्थक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। महिला सशक्तिकरण के लिए महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास की प्रक्रिया में सक्रिय सहभागिता से ही ऐसी गतिविधियों के लक्ष्यों की पूर्ति की जा सकती है। यह बात ग्रामीण क्षेत्रों के संबंध में और अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है। इसलिए, महिलाओं पर लक्षित विकासात्मक कार्यक्रमों में ग्रामीण महिलाओं का शामिल होना बेहद जरूरी है। इसी के साथ-साथ यदि स्वप्रेरणा के साथ गांव की पढ़ी लिखी महिलाएं एवं लड़कियां इन पदों पर आसीन होती हैं तो वे निश्चित ही अपने कार्यक्षेत्र मे सफल होंगी।





  अनुक्रमणिका  
शिल्पा नामदेव
तकनीकी सहायता अधिकारी,
UNDP-CDLG
सफलता की कहानी - सरपंच की जुबानी

प्रत्येक व्यक्ति की चाहत होती है कि उसका जीवन स्वच्छ स्वस्थ एवं निर्मलमय हो। लेकिन चाहत भर से निर्मलता नहीं मिलती, इसके लिये हमें अपनी जीवनशैली में आवश्यक सुधार एवं परिवर्तन लाना होता है, किन्तु अधिकतर लोग अपनी आदतों के शिकंजे में बुरी तरह जकड़े रहते हैं और न ही वे इसे तोड़ने का प्रयास करते हैं।

इन परिस्थितियों में किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे गांव की आदतों को बदलना बहुत कठिन कार्य हैं, लेकिन हर कठिन एवं मुश्किल कार्य, सच्ची निष्ठा, समर्पित भावना तथा सामूहिक प्रयासों के आगे नतमस्तक हो जाते हैं।

इस प्रकार की पुष्टि, भारत शासन द्वारा सम्मानित निर्मल ग्राम के सरपंचों को ब्रांड एम्बेसेडर के रूप में प्रस्तुत एवं प्रचारित करके पिछड़ें ग्रामों को कैसे निर्मल ग्राम बनाया जा सके, इस हेतु समग्र स्वच्छता अभियान कार्यक्रम अंतर्गत महात्मा गांधी राज्य ग्रामीण विकास संस्थान - म.प्र. जबलपुर में आयोजित प्रशिक्षण सत्र में प्रतिभागी के रूप में निर्मल ग्राम के सरपंचों ने अपने प्रयासों की सफलता की कहानी में व्यक्त किये।

निर्मल ग्राम से सम्मानित, जिला अनूपपुर के जतारी जनपद पंचायत अंतर्गत आदिवासी ग्राम पंचायत पिपरिया की पहली बार निर्वाचित महिला सरपंच श्रीमती ओमवती कोल ने निरक्षरता के बावजूद अपने गांव के बाहुवलियों से सामना करते हुये अपने ग्राम में स्वच्छता हेतु नालियां बनवायी। खुले में शौच करने वालों को इस शौच क्रिया से होने वाले स्वास्थ्य संबंधित एवं सामाजिक दुष्परिणाम से अवगत करा कर उन्हें शासन से सहायता प्राप्त करके सस्ते और टिकाऊ शौचालय बनवाने हेतु प्रेरित किया। शासन द्वारा प्रदत्त आर्थिक सहायता एवं तकनीकी जानकारी तथा मार्गदर्शन लेकर गांव की सड़कें बनवायी।

साथ ही सड़कों के सौन्दर्य हेतु वृक्षारोपण करवाया। साफ सफाई हेतु गांव के लोगों की निरंतर सभाऐं ली एवं सबको इस कार्य में सहभागी बनाया। गांव के बच्चों के स्वास्थ्य के लिये दो आंगनबाड़ी केन्द्र को व्यवस्थित किया तथा तीसरे केन्द्र के निर्माण में बाहूबलियों द्वारा तोड़-फोड़ एवं विरोध किये जाने पर इस प्रकरण को कोर्ट तक में ले गई। इन्होंने बताया कि अपने ग्राम को निर्मल ग्राम बनाने में गांव के सभी पंच, सचिव के साथ जनपद पंचायत के अधिकारी एवं कर्मचारियों ने भरपूर सहयोग दिया, जिसके कारण उनका पिपरिया गांव निर्मल ग्राम के रूप में सम्मानित हुआ है और यह सम्मान पाकर गांव के सभी लोग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

सफलता की इस कड़ी में जिला छिंदवाड़ा के मोहखेड़ जनपद पंचायत अंतर्गत निर्मल ग्राम से सम्मानित राजेगांव ग्राम पंचायत के सरपंच श्री के.आर. पंवार, जो कि कृषि विज्ञान से स्नातक है, साथ ही शासकीय सेवा से रिटायर्ड हैं, ने अपने गांव को निर्मल ग्राम का सम्मान दिलाने हेतु ग्राम पंचायत स्तर पर अनेक बार सामूहिक बैठकों का आयोजन किया साथ ही इस कार्य में महिलाओं को सहभागीदार बनाकर उन्हें टुकडि़यों में घर-घर निर्मल ग्राम के उद्देश्यार्थ ‘‘हम स्वच्छ रहेंगे, तब हम स्वस्थ रहेंगे’’ के नारे के साथ गांव के लोगों को स्वच्छता का स्वास्थ से क्या संबंध है, से अवगत कराते हुये उन्हें अपने गांव को निर्मल ग्राम बनाने हेतु प्रेरित किया।

सामूहिक बैठकों में लोगों के प्रश्न एवं संशय तथा असहमतियों पर जनपद पंचायत एवं जिला स्तरीय अधिकारियों को बैठकों में आमंत्रित करके उपरोक्त बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा एवं समाधान पश्चात आम सहमति प्राप्त करके, सुधार कार्य एवं नव निर्माण कार्य कराये गये। इन निर्माण कार्यों में गांव की सड़क, नालियां, बावड़ी, तालाब नडेफ पद्धति से खाद बनाना, केचुआ खाद निर्माण, गोबर गैस टेंकर, ड्रमों से कचड़ा बाक्स बनवाये गये। खुले में शौच क्रिया रोकने हेतु निगरानी समिति बनाई एवं लोगों को शौचालय निर्माण हेतु शासकीय मदद एवं तकनीक उपलब्ध करायी गई। लोगों ने स्वेच्छा से निर्मल ग्राम नाम में छुपे संदेश को आत्मसात् करके अपने घरों के साथ गांव के परिवेश को साफ सुथरा रखा।

श्री पंवार ने बताया कि उनके गांव की प्रगति को देखने जिला स्तरीय अधिकारियों के साथ-साथ नई दिल्ली से तीन बार पर्यवेक्षक आये और उन्होंने मेरे ग्राम को निर्मल ग्राम की श्रेणी में पाकर संतोष व्यक्त किया और उनकी अनुशंसा पश्चात यह राजेगांव ग्राम पंचायत निर्मल ग्राम के रूप में सम्मानित हुआ।

आज यह ग्राम पूर्णरूपेण खुले में शौच मुक्त हो चुका है और यहां के ग्रामवासी इस उपलब्धि को निरंतर बनाये रखने में भरपूर सहयोग प्रदान कर रहे हैं।





  अनुक्रमणिका  
रमेश गुप्ता
(सरपंचों से वार्ता आधारित लेख)
सीप का मोती

मैं कहाँ भूल पाया था उन निरीह सी आँखों को जो उस साँवले से चेहरे से झाँकती हुई पिछले तीस बसंत की हर वो दास्तां सुनाना चाहती थी जिसे उसने अबतक बस अपने अंदर ही छुपा रखा था। मुझे अभी भी याद है कि उस दुर्गम पहाड़ी के दूसरी ओर एक संकरे से पहाड़ी नाले के पास बसे इस छोटे से गाँव में जब भी मैं पहुँचता था, तब-तब मिट्टी/गारे से बने फूस के एक कमरे के मकान से यह महिला अपने दो मासूम बच्चों के साथ हमेशा सामने आ खड़ी होती थी - बिना कुछ बोले, बस अपने दोनों बच्चों को समझाती और चुप कराती हुई कि वे मेरी बातों के बीच में कुछ न बोलें। बच्चे तो बच्चे ही ठहरे, कुछ देर तो वे अपने माँ की नीली- मटमैली साड़ी के पल्लू का किनारा पकड़े हमें ऐसे देखते थे जैसे समूह बनाने के फायदे पर दी गई हमारी समझाइश उन्हें बखूबी समझ आ रही है। लेकिन कुछ ही पल में हमारी बातें उन्हें उबाऊ सी लगने लगती और वे बाल सुलभ चुहल करने लगते।

हमारी बातें इसे सबसे पहले समझ आ गई थी पर गाँव की दूसरी महिलाओं को साथ जोड़ने के प्रयास हमें कई बार करने पड़े। कभी-कभी तो हमारी टीम के साथी वहीं पर कह देते थे - ‘‘चलों साहब, कहीं दूसरे गाँव में तलाशते हैं। इनके बीच तो नाहक समय बर्बाद हो रहा है।‘‘ यह सुनते उसकी वही अनकही भाषा इशारा करती कि ऐसे में कहीं दोनों बच्चों के भविष्य को सुधारने का एक सहारा टूट न जाए। बहुत ही धीमी, दबी-दबी आवाज में वो दूसरी महिलाओं को बताना शुरू करती और हमें आश्चर्य होता कि जब इसने हमारी बात इतने अच्छे से समझ ली है फिर दूसरी महिलाएं क्यों नहीं समझ पा रही है। शायद दूसरी इतनी जरूरतमंद न रही होगी जितनी की ये थी। ऐसा लगता है जरूरतें ही हमारे ज्ञान चक्षु खोलने में हमारी मदद करती हैं।

"नाम क्या है लिखती हो?", हमने पूछा। "रमपतिया" जबाव आया, यानी राम हो पति जिसका। फार्म में नाम भरते-भरते मेरे हाथ ठिठक गए-क्या इस युग में भी सीता को अपने लव-कुश के साथ इस रूप में परीक्षा देना पड़ रही है। ‘‘पति का नाम?’’ मैंने मन में ही नाम सोचते हुआ पूछा पर उसने जबाव नहीं दिया। बस, मुस्कराते हुए आंखें झुकाकर बगल वाली महिला को कुहनी मारी कि वो जबाव दे।

"साहेब ... रघुवीर", साथ बैठी महिला ने तपाक् से कहा।

"तुम्हारे नहीं, रमपतिया के पति का ......", मैंने कहा।

"इ रमपतिया के घरवाले के नाम आहिं, साहेब। रमपतिया अपने से ना बताई, काहे से के अपन घरवाले के नाम इहां नाहीं लेत आहिं।"

परम्पराओं को इतना आत्मसात् करने वाले लोग? मुझे तो मन में विश्वास हो चला था कि समूह के अनुशासन का पालन करने में भी ये महिलाएं उतना दृढ़ संकल्पित होंगी, जितना परम्पराओं के मानने में, और मेरी बात सच हुई। रमपतिया के समूह ने मुर्गी पालन का व्यवसाय चुना। रमपतिया उसकी अध्यक्ष चुनी गई। दबी-दबी जुबान से बोलने वाली एक अत्यंत साधारण सी महिला के सबको इकट्ठा कर लेने की कला ने उसे नेतृत्व करना सिखा दिया।

अब हमारी टीम के सभी लोग इस गांव में बहुत सहज होने लगे थे। रमपतिया समूह की बैठकों का संचालन बहुत अच्छा करने लगी थी। नेतृत्व का गुण सिर्फ तेज आवाज में बोलने या दूसरों पर हावी होने से ही नहीं झलकता, नेतृत्व बहुत शांत रहकर सही निर्णय लेते हुए भी किया जा सकता है। जिस गांव से हमारे साथी दूर भाग रहे थे उसी गांव में अब मुर्गी पालन के ही कई समूह तैयार होने लगे। रमपतिया की सफलता ने उसे अपने समूह में ही नहीं पूरे गांव में उदाहरण बना दिया। तीन बर्षों के अंदर उस गांव के समीप के छः और गांवों में भी महिलाओं ने यही व्यवसाय अपना लिया। सफलता के संदेश के लिए कभी ढिंढोरा नहीं पीटना पड़ता, सफलता बहते बयार की तरह अपना संदेश पहुंचा देती है।

अगल-बगल के गांवों के साथ मिलकर मुर्गी पालने वाली महिलाओं का एक सहकारी संगठन तैयार होने लगा। दो वर्ष बीत गए, उस गांव में गए। मेरा कार्यक्षेत्र बदल चुका है। अपने शासकीय काम से मैं मई की दुपहरिया में उसी गांव से तीस कि.मी. की दूरी पर हूँ। मन हुआ कि क्यों न अपने बनाए समूहों के हालचाल पूछता चलूं। गांव अब भी वैसा ही था, कुछ इक्के-दुक्के मकान गांव की बाहरी सरहद के पास नए बने लग रहे थे। हाँ, एक बदलाव दूर से ही नजर आ रहा था - लगभग हरेक खपरे वाले मकान के ओसारे के पास मुर्गियों को पालने वाला दरबा। तेज गर्मी से बचाने को जालियों पर कहीं-कहीं चटाईयां भी लटकी थीं। इतने सारे सफेद चूजों को पालने के बाद भी मैं अचरज में था कि पोल्ट्री फीड की बदबू गांव में नहीं थी वरना किसी पोल्ट्री फार्म के पास से गुजरना हमारे गले में अटकी उबकाई को रोकने की परीक्षा से कम नहीं होता। जरूर उन्होंने सफाई से पालने की कला का प्रशिक्षण बेहतर ढंग से लिया है। यही सोचते-सोचते हमारी निगाहें उस फूस वाले एक कमरे को तलाशने लगी, पर वहां पर तो मिट्टी गारे की जगह दो कमरों वाला ईट से बना मकान नजर आ रहा था, जिसमें फूस की जगह खपरे लगे थे और जिसके बाहर की देहरी गोबर से बहुत साफ लीपी गई थी। खड़ी ईटों का किनारा बांधकर उसे चूने से सफेद रंगा गया था, अंदर जाने के दरवाजे के ठीक सामने देहरी के बीचो-बीच बने तुलसी चैरे को ढेर सारी कलाकृतियों में लाल-पीले रंग भरकर सजाया गया था। मई के महीने में जैसे लक्ष्मी के आगमन के लिये दीवाली सी तैयारी की गई हो।

"ये किसका घर बना है?" सहज उत्सुकता से मैने साथ चल रहे सरपंच जी से पूछ लिया।

"अपना नहीं पहचानित? इहै त आइ रमपतिया के घर। अबहिन ता पिछले महिना अपने घर मा कथा करवाई हई।", सरपंच ने कहा।

"और सुनि लेई साहब, उ त गांव के पंच बन गइ हाई", उसने आगे कहा।

मैं अचंभित था। इतनी कलां, इतनी सफाई और पंच चुन लिये जाने के गुण तब कहां दबे थे? शायद उसका मन शीशे के चिकने गिलास में गिरे चींटे जैसा था जो बाहर निकलने की लाख कोशिशों के बाद भी तब तक फिसलकर गिरता रहा जब तक गिलास में एक तिनका न डाल दिया गया जिसके सहारे वो बाहर निकल सका।

"कहां है रमपतिया?", मैंने पूछा।

"ओंह काइ से आवति हाई। टी.एस.सी. मा आपन घर के शौचालय खुदउ से बनावति हई। अब पंच ना बनाउब त ओके गांव के जनता का बनाई?" सरपंच ने कहा।

गीली मिट्टी से सने हाथ में तसला लिये वह दूसरे कमरे की ओर से चली आ रही थी। हमें देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। वो मुस्कान जिसमें निराशा की लकीर बिल्कुल नहीं थी। आत्मविश्वास माथे पर चमक रहा था, आंखें निरीह सी तो कतई नहीं थीं।

"कैसी हो बाई?" मैंने पूछा।

"हम सब पंचन के त करम बदलि गइ, साहब।" रमपतिया का जबाव था।

"तो पंच बनकर भी मजदूरी कर रही हो?" मैंने मजाक में कहा।

"काहे? आपन घरे के काम में काहे के सरम? दूसरे के लगाउब त घरे से ना मजूरी देइ के पड़ी?"

"अरे, ये तो बोलने लगी है। मैं तो मजाक कर रहा था बाई। ये तो बहुत अच्छा है कि अपने घर में खुद ही मेहनत कर रही हो, और पंच बनकर क्या किया?"

"इहाँ आई हम बताइत हैन।" वह अपने मकान के पीछे वाले टोले में जाने लगी जहां से उसे पंच चुना गया। ठीक बीच बस्ती में हैंडपंप की ओर दिखाकर उसने कहा - "इयह जौन हैण्डपंप लगा हैइ, त हमरे पंचेन के मांग से अबहिने लगा हाइ। पूरा मोहल्ला बहुत खुसी हाइ।"

कितना परिवर्तन आ गया था रमपतिया में! पांच वर्ष पहले की अबला नारी अब एक सबला नारी के रूप में मेरे सामने खड़ी थी, जो अपने घर के निर्णय में ही नहीं, समाज के हित के निर्णय में भी अपनी भागीदारी निभाने लगी थी। बूँद-बूँद से ही तालाब बनता है। आज एक नारी की ऊर्जा को सही दिशा मिलने पर इतना परिवर्तन आ गया। कल कई नारियाँ जब समाज परिवर्तित करने कृत संकल्पित होंगी तो परिदृश्य कुछ और ही होगा। सीप-सीप में मोती छिपा होता है जरूरत बस इन सीपों को खोलने की है।





  अनुक्रमणिका  
संजीव सिन्हा
उप संचालक
बदलती तस्वीर

अनुक्रमणिका
पेसा एक्ट, 1996 विषय पर प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण

फरवरी माह में दिनांक 14-16 तक तीन दिवसीय प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण (टीओटी) आयोजित किया गया। इस टीओटी में सभी क्षेत्रीय ग्रामीण विकास प्रशिक्षण केन्द्र, पंचायत प्रशिक्षण केन्द्र तथा संजय गांधी संस्थान, पचमढ़ी और महात्मा गांधी राज्य ग्रामीण विकास संस्थान के संकाय सदस्यों ने प्रतिभागिता की।

टीओटी के प्रथम दिवस में अतिथि वक्ता डा. बी.डी. शर्मा, भूतपूर्व आयुक्त, अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग, भारत सरकार ने प्रतिभागियों को सम्बोधित किया। यह उल्लेखनीय है कि डा. शर्मा भूरिया समिति के सदस्य भी रहे हैं।

डा. शर्मा में पेसा एक्ट, 1996 के पृष्ठभूमि, बनने के कारणों तथा एक्ट को विस्तार से समझाने के लिए अपने वक्तव्य को पांच चरणों यथा -

क. अंग्रेजी शासन से पूर्व परिदृश्य
ख. 1857 से 1935 के मध्य का परिदृश्
ग. 1935 से 1950 के मध्य स्थिति
घ. 1950 से पंचायतीराज अधिनियम के आने तक की स्थिति
ड. वर्तमान परिदृश्य

द्वितीय दिवस के लिए अतिथि वक्ता के रूप में श्री श्याम बोहरे ने जैव विविधता एक्ट, वन अधिकार अधिनियम एवं अन्य ऐसे अधिनियम व विभागीय प्रावधानों के बारे में प्रकाश डाला जो किसी न किसी प्रकार से पेसा एक्ट से प्रभावित होते हैं अथवा पेसा एक्ट के प्रावधानों को प्रभावित करते हैं।

तृतीय दिवस के प्रशिक्षण को श्री शरद चंद्र बेहार पूर्व मुख्य सचिव ने संबोधित किया। श्री बेहार ने संपूर्ण तैयार माड्यूल का विष्लेषण करते हुए प्रतिभागियों की शंकाओं का समाधान किया।

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